इस्लामिक बॉन्ड: इंडोनेशिया ने जुटाए 734 मिलियन डॉलर, जानें इसकी खासियत
इंडोनेशिया ने **इस्लामिक बॉन्ड (सुकूक)** की नीलामी से **12 ट्रिलियन इंडोनेशियाई रुपिया** (लगभग **734 मिलियन डॉलर**) जुटाए हैं।
इंडोनेशिया ने **इस्लामिक बॉन्ड (सुकूक)** की नीलामी से **12 ट्रिलियन इंडोनेशियाई रुपिया** (लगभग **734 मिलियन डॉलर**) जुटाए हैं। इंडोनेशियाई वित्त मंत्रालय के मुताबिक, नीलामी के दौरान **10 ट्रिलियन रुपिया** जुटाने का लक्ष्य था, जिसे पार कर लिया गया। इस प्रक्रिया में **19.91 ट्रिलियन रुपिया** की कुल बोलियां लगीं, हालांकि यह पिछले महीने की तुलना में कम रहीं।
इस्लामिक बॉन्ड (सुकूक) क्या होता है?
**सुकूक (Sukuk)** इस्लामिक वित्त का एक प्रमुख साधन है, जिसे **शरीयत (इस्लामी कानून)** के अनुरूप तैयार किया जाता है। पारंपरिक बॉन्ड ब्याज (इंटरेस्ट) पर आधारित होते हैं, जबकि **सुकूक किसी वास्तविक संपत्ति से जुड़े होते हैं**, और निवेशकों को उससे होने वाली आय में हिस्सेदारी मिलती है।
सुकूक की प्रमुख विशेषताएं:
1️⃣ **ब्याज रहित निवेश:** इस्लाम में ब्याज (रिबा) प्रतिबंधित है, इसलिए सुकूक **निश्चित ब्याज दर पर रिटर्न नहीं देते**।
2️⃣ **वास्तविक संपत्ति आधारित:** सुकूक को **भूमि, भवन, इंफ्रास्ट्रक्चर आदि जैसी संपत्तियों** से जोड़ा जाता है।
3️⃣ **लाभ-हानि में भागीदारी:** निवेशक को किसी प्रोजेक्ट या कंपनी के **मुनाफे में हिस्सा** मिलता है, लेकिन नुकसान की स्थिति में उसे भी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
4️⃣ **शरीयत बोर्ड की निगरानी:** किसी भी **सुकूक जारी करने से पहले इस्लामी विद्वानों की समिति (Shariah Board) इसकी समीक्षा** करती है और मंजूरी देती है।
पहले पाकिस्तान भी इस्लामिक बॉन्ड से जुटा चुका है फंड
इंडोनेशिया से पहले **पाकिस्तान** भी **आर्थिक संकट** से उबरने के लिए **सुकूक** जारी कर चुका है। पाकिस्तान ने **7.95% के रिकॉर्ड रिटर्न रेट** पर **1 अरब डॉलर** जुटाए थे।
इस्लामिक बॉन्ड का वैश्विक प्रभाव
सुकूक का उपयोग कई **इस्लामिक और गैर-इस्लामिक देशों** में किया जा रहा है। मलेशिया, सऊदी अरब, यूएई और बहरीन जैसे देशों के साथ-साथ **ब्रिटेन और दक्षिण अफ्रीका** भी इस्लामिक बॉन्ड जारी कर चुके हैं।
निष्कर्ष:
इस्लामिक बॉन्ड (सुकूक) वैश्विक बाजार में एक मजबूत वित्तीय विकल्प बनकर उभर रहा है। इंडोनेशिया और पाकिस्तान जैसे देशों द्वारा इसे अपनाने से यह साबित होता है कि शरीयत-समर्थित वित्तीय साधन न केवल इस्लामी अर्थव्यवस्था बल्कि वैश्विक बाजार के लिए भी फायदेमंद हो सकते हैं।